Monday, 30 September 2013

दूर वृक्ष पर फल लगे देख समझ अब पेट भर जाये

समाज ..जिनके मन अधूरे खुद में उन्हें पूरा होने की आस,
कुछ घूमते है प्यासे जिन्हें जन्मों की प्यास. 
कुछ बेगैरत से जिन्हें लज्जा छूती भी नहीं 
कुछ यहाँ कैद है इज्जत के मारे 
कुछ गाते है उल्फत के तराने वीररस की चाशनी पागकर
कुछ मजनू हुए कुछ चेला गलियों के 
कोई सूरज मिल जाता ..मिट जाती जन्मों की प्यास ..
दीप जलाकर रखा परकोटे तपिश मिले तप जाये,
दूर वृक्ष पर फल लगे देख समझ अब पेट भर जाये .- विजयलक्ष्मी 

Saturday, 28 September 2013

"शहीद ए आजम भगत सिंह "की स्वर्णिम याद में





सभी छैला हुए जाते है आजकल ,सरहद कहो चलना है किसे ,

कदम आगे बढाये वही अब जान प्यारी न हो जिसे ..
हमे खरीदने वाले खुद बिक गये है बाजार में 
हमे दौलत नहीं प्यारी, की तलवार से यारी 
चोला बसंती रंग रहे हैं अपना भी और बदल डाला है स्याही को लहू के संग 
अब वक्त कैसा आया है बेच रहे है ईमान ..कभी अनजाम ए मौत भाती थी 
भगत , आजाद के देश में लगी कौन दीमक जिसपर औलादे जान लुटाती थी 
तुम आओगे तो गद्दार कहाओगे ...और लक्ष्मी बाई भी मारी जायेगी
मुर्दों की बस्ती है ...यहा बस जान ही सस्ती है ...
कभी धन के लिए कभी धर्म के नाम पर ..
कभी मतलब की खातिर कभी बिकते ईमान पर
यहाँ मण्डी सजी है
हम बिकते रहे रोज हिज्जो हिज्जों में ..
ख्वाब बस एक ही रास आया है मौत का चलो खरीद लेते हैं
उसमें लटकर चौराहे चलो सलीब को उठाये वतन की गलियों में एक चक्कर लगाले
जब चलना चाहो चले आओ ..
हमे एक आवाज तो देना ..बाकी कुछ नहीं लेना ...
कुछ टुकड़े समेटेंगे ..कुछ कतरा याद है सांसे छूट जाएगी
रूह चली जाएगी जब घर अपने देह को जलाकर अंतिम विदा देना
बिक बिककर जितने बचे है शेषफल भेज देते हैं तुम्हारे पास .- विजयलक्ष्मी

Friday, 27 September 2013

यादें फाख्ता होती तो उड़ जाती

यादें फाख्ता होती तो उड़ जाती किसी छोर न आने की खातिर ,
हाँ जुगनू सी टिमटिमाकर कह देती होंगी भूल जाने की खातिर .

मगर होती है कुछ बेरहम सी चली आती है छोड़ कर किनारा ,
अब न पुकारेंगे , कभी यादों को हम भी याद आने की खातिर.

अच्छा हों तस्वीर पे रस्म ए मुजस्सम तश्विया ही हों जाये अब 
न आँसू न लहू बिखरेगे कभी , गीले से हुए आंचल की खातिर .

हूँ कौन बता ..क्या मेरा पता है ..ढूँढूँ खुद को अब मैं कौन गली 
चल पड़े कदम ,किस डगर कहूं, मिले कौन मुझे किसकी खातिर.

एक चाल अजब सी चल गया वक्त भी ,जो मेरा है मेरा ही नहीं
पूछ रहा मुझसे ही खड़ा..बता ?देह पीर जगी या नेह की खातिर. -- विजयलक्ष्मी

Thursday, 26 September 2013

हमारी संसद में




हमारी संसद में
जितने जन है 
सब देवगण है 
देव 
सिर्फ पूजे जाते है
वो स्वयम नहीं करते कुछ 
देखते है तमाशा 
बनाते है तमाशा 
और 
बनता है तमाशा जनता का 
हंसती है महंगाई 
दस्ते है घोटाले 
चीखती है 
मानवता और मरती है 
इमानदारी 
होता है 
हलाल या झटका 
इंसानी जमीर 
नोट के चाकू से 
दंगे बे काबू से 
धर्म लड़ते है बंटवारे पर 
होती है बन्दर बाँट 
उलटी होती खाट
जनता की 
और ऐश होती 
देवगणों की 
जय हो देवा 
अपनों को मेवा 
बाकी को धोबी पछाड़ 
टूटता रहे पहाड़ 
गरीबी का 
देश की बदनसीबी का .

- विजयलक्ष्मी

वर्णमालाओ का शहर


वर्णमालाओ का शहर 
क्या मिले 
सकूं के शजर 
शब्दों के सुंदर दोने ..
कही लगे तो नहीं खोने 
कुंजन मे ..कलियन में 
गाँव की गलियन में 
शहर के शोर में 
चित्त के चोर में 
बैठकर भिगोने में 
नदिया किनारे पर 
लहर के इशारे पर 
कश्ती सी मैं 
बह चली 
दिल के इक कोने में 
वो 
जो तस्वीर है एक 
जिसपर 
टिकती है नजर 
अनायास ही 
हटाती हूँ सप्रयास ही 
बैठ जाते हो 
मात्रा से 
तुम 
कभी सूरज बनकर 
कभी चाँद 
कभी फूल तो कभी पवन बनकर 
झिंझोड़ देता है झंझा सा 
मुझको 
और वही एक अहसास 
तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहने देता 
मुझको 
चलता है साथ 
न होकर भी पास 
कैसे कहूं दूर
जैसे नील गगन पर 
चकमक सा 
धरती और अम्बर से 
खोलकर खिड़की 
जैसे 
क्षितिज पर हो खड़े 
"मैं और तुम ".
 विजयलक्ष्मी

Wednesday, 25 September 2013

न मैं ख्वाब हूँ कोई कह. क्या तू हकीकत है

न मैं ख्वाब हूँ कोई कह. क्या तू हकीकत है ,
नैन बंद हो भी जाये कैसे नींद की बसीकत है 

अँधेरा गहन सूखे दरख्तों के दर ओ दीवार है 
दीप देहलीज का लगाएगा आग ही हकीकत है 

जलने दोगे , मेरे बाद भी जलोगे अहसास में
बुझाने चलोगे , जलोगे साथ यही हकीकत है

आब ए चश्म कातर धुंधलाई सी रौशनी क्यूँ
वक्त के आंचल पे लिखी तेरे नाम वसीयत है

तराशा जिस बुततराश ने, मुझमें जान फूंक दी
वही तासीर ए तस्वीर छप बन गयी हकीकत है .- vijaylaxmi
 

तुम इकरार करो या न

तुम इकरार करो या न ,तुम जानो 
मुझे तुम्हारी बात से नहीं है इनकार |

रंग दिया तुमने किस रंग में मुझे 
आईना पहचानने से करता है इंकार |  

दंगे फसाद की आड़ ले बेचा वतन 
उहापोह,वोट का छीनरही है अधिकार | 

फतवों ने मजाक बना दिया मजहब 
हिंदुत्व को बंधुआ बना रही है सरकार |

ऐशगाह शिक्षालय हुए कार्यालय नासूर
चुनावी शतरंज ये कर रही है बंटाधार | - विजयलक्ष्मी 

मुसलसल सहर हों जाये तो अच्छा है .

बहुत दिनों से धुंध छाया है शहर में ,
आज मुसलसल सहर हों जाये तो अच्छा है .

मौसम में कहर ही कहर है आजकल ,
ये दिन भी थोडा सम्भल जाये तो अच्छा है .

खंजर पे धार लगा वार को बठे है तैयार ,
मौत का इल्जाम न आये उनपे तो अच्छा है .

हम मिलने न आ सके तो बेवफा पक्के है 
देख जबां बोली मौत ए सामां तो अच्छा है.

मेरी मौत की खबर की दुआ मांगे बैठे है ,
सोचते है अब दुश्मन ही रहे तो अच्छा है ..विजयलक्ष्मी

Tuesday, 24 September 2013

कभी जो इन्तखाब हुआ जैसे पूरा ख्वाब हुआ

कभी जो इन्तखाब हुआ जैसे पूरा ख्वाब हुआ 
लगता रहा हमे भी यही कुछ तो लाजवाब हुआ 

मतलबी ये दुनिया वतन के रहनुमा भी नकारा 
ऐसे में हौसला आना ,दीपक तो लाजवाब हुआ 

तूफ़ान गुजरा अभी गली से ,जलता रहा चिराग
देखिये जरा नजारा रोशन हुआ तो लाजवाब हुआ

मुश्किल है बयाँ इजाफा ए इजतिराब ए हिन्द में 
रोके है कदम उसूल ए इजतिरार तो लाजवाब हुआ

फंस गये सियासती में खुद हुक्मरान ए हिन्द भी
फैला मुल्क में अजब सा अज़ाब भी तो लाजवाब है .- विजयलक्ष्मी

इन्तखाब = चयन ,
इजाफा ए इज्तिराब ए हिन्द -हिन्द में बढती हुयी व्याकुलता (अधीरता )
उसूल ए इजतिरार = नियमों की विवशता (लाचारी ),

इन्साफ कब मिलेगा

इन्साफ कब मिलेगा :--
..
लटकते चमगादड़ बोले हम तो लटके है उलटे ,
तुम्हे भी उलटे ही लटकना होगा ,,
गहन अँधेरी रात है बहुत लम्बी दूर तलक ,
मंजिल की तलाश में तन्हा भटकना हों ,,
सरोकार किसका किससे है कोई नहीं जानता ,
कानून बना है , दर दर भटकना होगा ,,
बहुत सटीक न भी फिर जितने बने है पाने उसे ,
वक्त ले गलियारों में भटकना होगा ,,
हों सकता तुझे जीते जी इन्साफ न मिले यहाँ ,
रूह को वंशजों संग भी लटकना होगा ,,
न्याय की लड़ाई में इंसाफ की खातिर देख लो ,
हकीकत ,एक जन्म तो लटकना होगा ,,.- विजयलक्ष्मी

अपने घर में खुश बहुत है औरों पे कब्जा करते नहीं

सत्य को साधन नहीं मुकम्मल राह की तलाश है ,
जिंदगी तूफ़ान सी ,मद्धम सी इक आस है ,
किसने आशा को खो दिया, किसने कहा निराश है ,
पंचांग में बस शब्द है बाकी तो कुछ भी नहीं ,
तलवार की धार को मगर अब लहू की प्यास है ,
जिंदगी अब तू जुआ सा हों गयी ,
ताश के पत्तों का घर कोई पत्थर बताकर चल दिया ,
मंजिल की फ़िक्र वो करे जिसे खुद पर नहीं विश्वास है ,
एक दिन की बात क्या दर्द अब तो अनवरत ही साथ है ,
कायरों की बात क्या मैदान ए जंग से भाग खड़े होते है जो ,
उसपे तुर्रा लड़ने की बताते नई ये रीत है ,
इंसानियत तो मर गयी अब जनाजा भी उठाओ ,,,
बेटी को कह दो ...अब जन्म न ले जमीं पर ,
सर उठाकर चलना दूभर हों गया है ,
ये देश अब निरंकुशों का घर हों गया है ,
रास्ते सीधे नहीं हैं ,सेंध लगती चोरी से ,
बस में कुछ नहीं होते जिनके वो अकड़ते सीना जोरी से ,
हमको मगर उस हाल में भी पीठ दिखाना भाता नहीं ,
मौत भी मंजूर है ,लहू के धरे बहे ,,,
झंझावात उठा दें एक ही हुंकार से ,
छोड़ दे दुश्मन मैदान एक ही ललकार से ,
खौफ नहीं अदब है बस ,काँटों से डरते नहीं ,
अपने घर में खुश बहुत है औरों पे कब्जा करते नहीं ..विजयलक्ष्मी

Monday, 23 September 2013

अबूझ चलता है कल्पतरु की इच्छा लिए

जीवन का लक्ष्य क्या सत्य है असत्य क्या 
या पाना जीवन को पूर्णता से किस ठौर 
या सह जाना जीवन को कठोरता से जिस तौर 
नियमित नियम सा बन जाना हर छोर 
खो जाना स्वप्न सजीले सतरंगी या सहरा से सुदीप्त 
या प्रचंड ज्वाल ज्वाला ज्वलित हो जीवन को जला रही हो
या श्वेत वर्णा हो श्वेत हो गयी परीक्षा ज्वलंत 
आशावादी चोला और भीतर से निराशा लिए विचार 
अजब सी पहेली रासायनिक सहेली 
समवेत स्वेद कण जीवन का सार 
कदम चले उठ
स्मृति स्मरित साथ साथ अबोध सा गर्व गुजित गगन
मन वीणा झंकृत सप्त स्वर सुरीले या अवसाद युक्त
मैं में मैं ही नहीं या अभिभूत समाहित सी विलग
किस पथ चलना पथिक पहचान नहीं
अबूझ चलता है कल्पतरु की इच्छा लिए
तप पाप सत्य असत्य ज्ञान-अज्ञान का अभिमान लिए
विचर रहा जग में जगत जगदीश जन जन में जनचारित अनेक से नाम लिए
क्षण भंगुर जीवन क्षणिका के वशीभूत हुआ
प्रीत विरह मिलन भावों से घनीभूत हुआ
समय चक्र बेल सा बढकर चढ़ता चला राथिवान सा
अंत समय तक रहा ढूंढता अमन चमन के बागवान सा
मैं ही हूँ मैं नहीं कहाँ ..मैं में मैं घनीभूत हुआ
भूल गया छकड़ी सारी नून तेल लकड़ी के वशीभूत हुआ
न सागर न नदिया तीरे नीर नयन अवतीर हुआ
चल छुट गया जमी से जीवन इहलोक उड़ान शमशीर हुआ
अन्तरिक्ष पटल पर परिलक्षित किसने किया
स्वर्ग नर्क कहाँ कैसे वशीभूत चिन्तन चित्त प्राचीर हुआ .- विजयलक्ष्मी

अख़बार का पन्ना फडफड़ा कर रह गया दर्द से

मजबूर हो जाये इन्सान सोचने पर और अंदर तक हिला जाए दुनिया की खबर 
क्या है जिहाद ये कैसा जिहाद है कौन है ठेकेदार इस जिहाद की खबर 
केन्या की खबर या सीरिया की खबर देखलो पलट कर हिंदुस्तान की खबर 
फतवों की खबर हालत की खबर खुनी हमलो की भरी तस्वीर की खबर 
देश की पढ़े या विदेश की खबर यहाँ तो छनछन कर ही आती है खबर 
बिका हुआ मिडिया बाजार है लगा जिसके हाथ लाठी हाथ उसी के है खबर 
बिखरी हुयी है लाशें बहता हुआ लहू है मर रही इंसानियत की खबर
नुचती हुयी देह चीखती हुयी रूह बंद हैं दरवाजे फिर भी उठती हुयी खबर
बंदूक की नोक पर बम की झोक पर बनती हुयी खबर
न उम्र देखता कोई महज पैशाचिक पृवत्ति सर धुनती हुयी खबर
बनी जिन्दगी इम्तेहान जिन्होंने तस्वीर खींच ली बन रही है अब उनकी ही खबर
अख़बार का पन्ना फडफड़ा कर रह गया दर्द से... लिखते हुए खबर
चीखकर रूह कांपती है दर ब दर सी नजर में भर कर खबर
हर ख्वाब टूटा है इंसानियत के भीतर जहां पुष्प थे लाश आई नजर
कुंद होता है दिमाग ..जब देखते हो आँखों से लहुलुहान खबर
पत्रकारिता का जज्बा ईमान पर छा जाये तो जिहाद बन जाती है खबर .- विजयलक्ष्मी

Sunday, 22 September 2013

एक खत बेटी के नाम ..



एक खत बेटी के नाम ..
मालूम है कोई भी माँ अच्छी नहीं होती अगर बेटी अच्छी नहीं हो ..तुम जानती हो तुममे मैं खुद को ही देखती हूँ ..बेटी माँ का ऐसा सपना होती है जिसमे वो अपनी मर्जी से रंग भरती है और मुकम्मल होने पर खुश होती है तब बनती है वो एक अच्छी माँ .
तुमने मुझे इस तरह खुश होने का मौका दिया ...जब तुम्हारी तारीफ होती है उसमे माँ भी शामिल होती है अनायास ही और बुराई में भी ..अभी नहीं समझोगी ..वक्त आएगा तब ..और तुम जब फिर मुस्कुराओगी तो मैं भी तुममें ही छिपकर मुस्कुराऊँगी ...ये दुनिया हमे ही सजानी है मिलकर ..कोई नहीं आएगा बाहर से ...अपने घर से ही शुरुआत करनी होगी मैंने तो पहल कर भी दी है अब आगे की राह भी ऐसे ही मिलकर चलेंगे ....दोगी न साथ तुम भी ...मेरा इस परम्परा को बढाने में ..
तुम्हारे हिस्से कोई एक दिन नहीं है ...हर वो लम्हा है जब दिल धडकता है और तुम खिलखिलाती हो ,तुम्हारे आंसू भी मेरी जिन्दगी का इम्तेहान होते है ..हर ठोकर के बाद भी तुम्हारा मुस्कुराना मेरे हौसले को बढाता है ...तुम एक दिन की मोहताज नहीं हो ..मालिक हो हर अहसास की हर याद की ...जाने क्यूँ भूल जाती है दुनिया ..बेटी के बिना तो दुनिया का वजूद ही नहीं है ..फिर मात्र एक दिन ...क्या कमाल है न ..मैं हमेशा तुममे जिन्दा रहूंगी ...मेरे देहावसान के बाद भी हमेशा हमेशा ...जैसे मेरी माँ मुझमे !!
तुम डरना नहीं कभी थक कर मत बैठ जाना हौस्लेकी उड़ान में बहुत ताकत होती है तुम ये जानती हो और ये मैं जानती हूँ अब तुम टूटोगी नहीं ...कभी भी किसी भी हालत में .....तुम !मेरी ताकत हो !!
...तुम्हारी माँ !!.
------ विजयलक्ष्मी

बेटियाँ ,संस्कार ,संस्कृति की वाहक ,

बेटियाँ ,संस्कार ,संस्कृति की वाहक ,
हमारे उलटे विचार बने सदा ही बाधक 
कन्या का दोष क्या है ..दोष हमारा और हमारे द्वारा निर्मित समाज का है 
जिस समाज में देह और नेह का अंतर नहीं मालूम ..क्या खाक सुरक्षित रहेंगी बेटियां 
दिश बेटियों का नहीं हमारी सोच की दिशा और दशा दोनों का है ,
जिस आहट से दिल दहलता है कहीं वो हमारे घरों से तो नहीं निकली 
कही उसके खेवनहार हम ही तो नहीं ..
प्रेम प्यार की धरोहर नष्ट करने वाले अत्याचार अनाचार की जड़े हमारे घर में तो नहीं पनप रही ..
सोचो ..और देखो कहीं इन गुनाहों के नींव में कोई ईंट हमने तो नहीं धरी ..
बस ..मैं और तुम बदले तो सब बदल सकते है ..येही सच है न ..
तुम भी सोचकर देखना एक बार ...मेरे कहने से ,,
शायद कोई रास्ता निकल जाये ...राह सुदृढ़ हो जाये ,और भविष्य सुरक्षित !
--- विजयलक्ष्मी

जंगली बेल सी बढती है बेटियां ,

किसी ने कहा ..जंगली बेल सी बढती है बेटियां ,
किसी को कर्ज सी किसी फर्ज सी लगती है बेटियां
किसी ने जन्म से पहले मारी ,किसी की ने "आँखे के दूध "से मारी बेटियां
किसी के काँधे का बोझ बन गयी किसी की इज्जत कहा गयी बेटियां
बहुत दर्द होता है माँ के सब सुनकर है मेरे जी का जंजाल बेटियां
मुझे तो लगती जाँ से प्यारी ये बेटियां
मेरे घर आंगन की है फुलवारी बेटियां
जिस डाल पे बिठाया बैठ जाती बेटियां ,
सहकर भी हर दुःख को सुख बताती बेटियाँ
किसी मुंडेर चिड़िया सी चहचहाती बेटियाँ
महक से अपनी घर आंगन महकाती दूसरों का बहुत याद आती है बेटियाँ
अपनाकर तनमन से वंशबेल भी बढाती बेटियाँ .
लगती बोझ किसी मुझको हर अहसास में भाती है बेटियाँ
चाँद का टुकड़ा सी सूनी सी जिन्दगी की बहार है बेटियाँ
अल्हड सी चपला सी चंचल मुस्काती खिलखिलाती याद आती है बेटियाँ
आँख की नमी को हमसे भी छिपाती है बेटियाँ
बराबर की हिस्सेदार होकर सर सदा अपना झुकाती है बेटियां
क्या क्या गिनाऊँ गिनती कर्तव्यबोध भी सिखाती है बेटियां
दोजख सी दुनिया को स्वर्ग सा बनाती हैं बेटियां .
किसी ने कहा ..जंगली बेल सी बढती है बेटियाँ
बहुत दर्द होता है माँ के सब सुनकर है मेरे जी का जंजाल बेटियां
मुझे तो लगती जान से प्यारी ये बेटियां .- विजयलक्ष्मी
 

Friday, 20 September 2013

संविधान में देश अपना आजाद है




" लिखा है संविधान में देश अपना आजाद है ,
खा रहे है रक्षक इसे किया मिलकर बर्बाद है.

सुना था दीदार ए जन्नत होती धर्माचरण से 
धर्म के नाम दंगो से हुआ भाई-चारा बर्बाद है.

रंग ए लहू ,लाल है सभी का राम क्या रहीम
दीवारे खींच दी काफिरों ने धर्म ही बदनाम है.

इंसानियत खो रही है, छिप गयी किसी कोने
जमीर मर चुका दिखता हर तरफ श्मशान है.

हुए देह के पुजारी सब ,खोये नेह के पुजारी अब "
छिन्द्रान्वेश दोषारोपण दूसरो पर कैसा बर्ताव है .


 विजयलक्ष्मी

Thursday, 19 September 2013

गुजरा इधर से कौन है




खुशबू सी बिखरी हैं यहाँ गुजरा इधर से कौन है ,
दूर तक बिखरा है रंग और तारागण ये मौन है 
बयार बह चली मलय सी मद्धम स्वर हैं गूंजते 
मुस्कुराती नजर पुष्पित चमन ये चितेरा कौन है 
रंग रहा जिस स्वप्न को पलकों में आकर बस गया 
भोर बेला संग में सूरजकिरण, तितली हुआ मौन है .
--विजयलक्ष्मी 

कर्ण ,बिक गया बेमोल




कर्ण ,लुटा दिया दोस्ती में खुद को 
बिक गया बेमोल 
बैठे रहे कुछ लोग रहे तराजू तौल 
सांस सांस को जोडकर खड़ा रहा बाजार 
जन्म से लेकर मृत्यु जिसका हुआ व्यापर 
स्वार्थ के अंधे कहूँ कौतुहल का जाया 
जन्मगाथा रही अजब क्यूँ कौन्तेय कहाया 
एक कृष्ण दो माँ मिली 
कर्म कर्म अजब पाया 
राधा का हो न सका कुंती ने ठुकराया 
मिली विरासत त्याग दी 
कैसा भाग्य पाया 
क्षत्रिय रक्त से भी रथ चलवाया 
दे सुकून राज्य रजा को 
उसने पाकर सब गंवाया 
कैसी किस्मत बदी भाग्य ने 
अजब लिखवाकर लाया 
फिर भी हिम्मत लिए अजब की 
नवल इतिहास रचाया 
समय चक्र ने देखो कैसा खेल रचाया 
गुरु बनाये परशुराम से 
समय ने फिर ठुकराया .
कैसा वीर अर्जुन था चस्पा राजवंश
मिला विरासत का हिस्सा लड़, राजपुत्र कहलाया 
खेल खिलाता समय सभी को 
कर्ण ने समय को खेल खिलाया .
- विजयलक्ष्मी 

मुस्कुरायेगे हम जख्मों को भुलाकर



मुस्कुरायेगे हम जख्मों को भुलाकर ,
तुम भी साथ दोगे न मेरा मुस्कुराकर .

लाइलाज जख्मों का इलाज भी यही है 
बैठो तो कुछ पल तुम भी पास आकर .

तेरे सिवा,याद कहाँ जमाने का दस्तूर
चले जाना तुम जमाने को समझाकर.

कहता है प्यासा मुझको सहरा है खुद
चले जाये बदरा कुछ बूँद ही बरसाकर .

खिल उठें मन के दरीचे कर सोलहश्रृंगार

                                                                   संदेश ले आई पवन चली गयी महकाकर .
                                                                            ---- विजयलक्ष्मी 

शैदा समझती है आज भी दुनिया

शैदा समझती है आज भी दुनिया जिसकी खातिर मुझे ,
वो दबी जुबाँ से भी कभी शनाख्त ए शनासाई कबुलते नहीं .
शहाब है वो जमीं पर शहामत से है उसकी वाकिफ 
साहिबे अख़लाक़ ओ साबिर, पनाह शहरखामोशां में कबुलते नहीं .- विजय .

दीदार ए आरजू उनकी






















                 
 दीदार ए आरजू उनकी मुकम्मल तो हो जरा ,
आईना हमको तो उनको यूँभी हैं दिखाया किये 

राज ए सफर है क्या जो कलम चल पड़ी यूँही 
राहे निशाँ बदस्तूर हम तो यूँही है सजाया किये 

देखे नहीं क्या जहां में , तुमने एसे खुदाई बंदे
आरजू में दिलकी खुदको यूँही है जलाया किये 

न शिकवा लबों पे आया न आरजू है मिलन की 
खुद में ही जलके खुद को यूँही हैं दफनाया किये

कुछ की आरजू ,रोशन सितारा हो नाम अपना
दर्द ए गम लेके जहां से कोई यूँही है किनारा किये .

- विजयलक्ष्मी

हम जिन्दा रहे गमों के सीप में



श्रद्धा और श्राद्ध बहुत तालमेल है इनमे दोनों एक दुसरे के साथ चलती है 

तुम ही कहो क्या एक दुसरे से अलग अस्तित्व बकाया है कहीं 
चल दिए तुम पूजने और देखती थी रास्ता मैं इंतजार पलकों में लिए 
कुछ और याद करने की फुर्सत किसे है जलता अहसास का दीप बकाया है यही .
तुम तर्पण कर सके नहीं और हम जिन्दा रहे गमों के सीप में 
शेषफल तुम हो बाजार का और मैं ,जो और कहीं भी न समाया हूँ वही - विजयलक्ष्मी

Tuesday, 17 September 2013

आज ढूंढ ली राह हमने भी खुदके भटकने से पहले |




आज ढूंढ ली राह हमने भी खुदके भटकने से पहले |
उडी खुशबू महफिल में कुछ उनके बहकने से पहले |

हम देखा किये उन्हें उनकी नज़रें इनायत ही ना हुईं |
क्यूँ गिर रही है बिजलियाँ हमपर चमकने से पहले |

निगाह भरकर देखा किये हम जाने किस सुरूर में |
नजरों में भर लिया था उन्हें पलक झपकने से पहले|

सिहरकर रह गये हम भी ख्याल औ ख्वाब में उनके |
सरगोशियाँ सी होने लगी थी उनसे लिपटने से पहले|

मासूम सी कली थी मैं भी फूल बन महकने से पहले |
चमकती थी चांदनी सी मैं सूरज संग दहकने से पहले|

..विजयलक्ष्मी संग अंजना 

महकते रिश्तों से भी जल रहा है आदमी |

इबारत लिखी गयी जो दिल पर मिटती नहीं कभी 
ये और बात है जुबाँ पर नाम आये या न आये कभी .- विजयलक्ष्मी



खामोश ख्याल और याद पलपल घुमड़ती है भीतर भीतर ,
शोर बहुत है बाहर, मद्धम सा संगीत बजता है भीतर भीतर.- विजयलक्ष्मी



हर काम अधूरा है किया हुआ देश बर्बाद पूरा है ,
इमदाद खाते है नेता , जनता की पीठ पर छुरा है .- विजयलक्ष्मी



रौनक ए महफिल शबनमी ,पडती ठंडी फुहार है ,
जिनके तबस्सुम के नूर से जिन्दा वो खुद बहार है .- विजयलक्ष्मी


घर ठिकाना नहीं ईंट पत्थरों का तो मकाँ होगा ,
शिद्दत ए अहसासात ए मुताल्लिक ही जहां होगा .- विजयलक्ष्मी



अपने गिरेबाँ में भला झांकता कौन है,
खुद कितने पानी में खड़ा आंकता कौन है .विजयलक्ष्मी



महकते रिश्तों से भी जल रहा है आदमी |
प्यार को भी नफरत में बदल रहा है आदमी .- विजयलक्ष्मी

हो रही है राजनीति लाशों के ढेर पर ,

हो रही है राजनीति लाशों के ढेर पर ,
खा रहा है इन्सां इंसानियत बेचकर .

पढ़ेलिखे है गर जाहिलो सा हाल क्यूँ 
हैवानियत देखो हंस रहे गला रेतकर.

गद्दी की खातिर अपनी टोपी बेच दी 
गद्दार वो भी वोट दी सामान देखकर .

सस्ता अनाज, मोबाइल और लैपटॉप
खूनपसीने की कमाई से टैक्स पेलकर .

पूछो सरकारी विद्यालय से परहेज क्यूँ
क्यूँ किया अपोइन्टमेंट जाति देखकर .

वक्ती सुविधा नहीं अब न सूट न पैसा
अब चुनेंगे नेता भी कामकाज देखकर .

सिखाओ सबक चुनाव की पाठशाला में
कैसी सरकार, मिले स्वाभिमान बेचकर !- विजयलक्ष्मी

Monday, 16 September 2013

सूरज निकलने को आतुर है



सूरज निकलने को आतुर है ,

धरा से मिलने की मन में आस लिए 
कलकल जल बहता स्नेहसिक्त 
गुंजित दिशाए कलरव की गुंजार लिए 
इन्तजार के पल धडकने लगते है
मन के भीतर नव उजास लिए 
लहरे समन्दर की जैसे बुला रही है
धरती तकती राह नयनों में विश्वास लिए .- विजयलक्ष्मी 

सिलसिला ए हिचकी बदस्तूर जाती है

सिलसिला ए हिचकी बदस्तूर जाती है ,
हिचक है कि टूटी नहीं ,बदस्तूर जारी है .

अहसास ख्वाब का या ख्वाबों में अहसास 
ख्वाब ओ अहसास मुझमे बदस्तूर जारी है .

नमी मुझसे गुजर बादलों तक चली गयी ,
हवा का आंचल भीगना बदस्तूर जारी है .

टोपी का खेल हुआ सरकारी ,कैसी दोस्ती 
सियासी खंजर का खेल बदस्तूर जारी है .

जल गये घर, आग ने मजहब नही देखा
जलना मन्दिरमस्जिद का बदस्तूर जारी है.- विजयलक्ष्मी 

लोकतंत्र का जीवन

लोकतंत्र का जीवन ..वोट ..
वोट की राज

नीति मतलब ...धर्म और जाति
हिन्दू ..मुसलमान ..सिख ..इसाई 
दिखावे के भाई भाई 
असली बात ...राजनीतिज्ञों के मोहरे 
मोहरे भी अंधे सिपाही 
मौत का खेल ,आपसी दुश्मनाई..
अँधा बाँटें रेवड़ी अपने अपने को दे 
बाकी सब मुर्दा भये... मरे पड़े निज गेह .- विजयलक्ष्मी




अर्थ की अर्थी निकाली यही वक्ती दस्तूर है

....Hot & cool vs bahan ji ...

दिखावा आधुनिकता का बना दस्तूर है ,
ये सच की दुनिया से ले गया बहुत दूर है 
कल्पना की बातें कल्पना हुयी जिन्दगी 
अर्थ की अर्थी निकाली यही वक्ती दस्तूर है.- विजयलक्ष्मी

नाम ए जाम पीकर मस्त जब दीवाने हो

दर्द जब हद से गुजर जाये जिन्दगी 
दीवानगी की तल्खी जिन्दगी में उतर जाये 
और मरने की तमन्ना मौत के सर पर संवर जाए 
क्या वफा ओ उम्मीदे की चाहना लूटना है जहां तो लुट जाये 
जरूरत खत्म हो जाये पाने की आब को 
न रहे बाकि बानगी कोई पूरा करे जो ख्वाब को 
कोई हद जब आड़े नहीं आती 
रूह में उतर जिन्दगी फना हो जाती 
बहार मजबूर हो जाये उतरने को मेरी गली 
बता क्या जरूरत खौफ की या रूह जब मतवाली हो चली 
बेख़ौफ़ चेहरों चमन खिल उठे खुदाई का
तोड़ने को बंधन कुरआन न फतवा रहे
जिन्दगी की बानगी बता अब बाकी क्या रहे
मिटने की कसमे और रस्मे जब रवानी ले चुके
हूर क्या जानेगी जालिम लुटने का मजा क्या है
देश दुल्हन जिनकी खातिर बाकी कोई जफा क्या है
मिटने उतरे मैदाने जंग तो फिर जिन्दगी की आरजू क्या है
वक्त को चलाने दो खंजर ..पीठ क्या जख्म सीने पे क्या है
हर हिजाब टूट कर गिरे और जमीर क्या मर जिन्दा ही क्या है
नाम ए जाम पीकर मस्त जब दीवाने हो
मौत का फिर खौफ क्या है .- विजयलक्ष्मी